कुंभ के बारे में

कुंभ की उत्पत्ति बहुत पुरानी है और उस काल के समय की है जब समुद्र मंथन के दौरान अमरता को प्रदान वाला कलस निकला था। इस कलस के लिए राक्षसों और देवताओं के बीच भयंकर युद्व हुआ था। अमृत कलस को असुरों से बचाने के लिए जो देवताओं से अधिक शक्तिशाली थे उन देवताओं की सुरक्षा ब्रहस्पति,सूर्य,चंद्र और शनि को सौपीं गई थी। चार देवता असुरों से अमृत कलस को बचाकर भागे और इसी दौरान असुरों ने देवताओं का पीछा 12 दिन और रातों तक किया। पीछा करने के दौरान देवताओं ने कलस को हरिद्वार,प्रयाग,उज्जैन और नासिक में रखा। इस पवित्र समारोह की स्मृति में ही हर 12 साल में इन 4 जगहों पर कुंभ मनाया जाता है।

धार्मिक महत्व

यह त्योहार हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। हर कुंभ अवसर पर, लाखों हिंदुओं ने समारोह में भाग लिया है। हरिद्वार में 2003 में कुंभ के दौरान 10 लाख से अधिक भक्त इकट्ठे हुए थे। भारत के सभी कोनों से संन्यासी, पुजारी और योगी कुंभ में भाग लेने के लिए एकत्र हुए। हरिद्वार को बहुत ही पवित्र माना जाता है, इस तथ्य के कारण कि गंगा यहां से पहाड़ों से मैदानों में प्रवेश करती है।

इस त्योहार पर पूरे भारत के सभी आश्चर्यजनक संतों द्वारा दौरा किया जाता है। नागा साधु एक ऐसे हैं, जो कभी भी कोई कपड़ा नहीं पहनते है और राख में लिप्त रहते हैं। इन लंबे बाल वाले नागाओं पर भीषण सर्दी और गर्मी को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उर्द्धवावाहुर्रस वो लोग हैं जो शरीर को तप से निकालने में विश्वास करते हैं। पारिवाजक वो लोग हैं जो चुप्पी साधे रहते हैं और लोगों को अपने रास्तों से बाहर निकालने के लिए घंटियों का प्रयोग करते हैं। सिरसासिन वो लोग हैं जो 24 घंटे सर के बल खड़े होकर तप करते हैं। कल्प वासी वे लोग हैं जो दिन में तीन बार स्नान करते हैं और पुरे कुंभ के दौरान गंगा के किनारों पर समय बिताते हैं।

यह माना जाता है कि कुंभ के दौरान स्नान करना सभी पापों और बुराइयों का इलाज करता है और बाघ, मोक्ष प्रदान करता है। यह भी माना जाता है कि कुंभ योग के समय गंगा का पानी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और कुंभ के समय जल  सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की सकारात्मक विद्युत चुम्बकीय विकिरणों से भरा होता है ।